‘दोस्तजी’: ‘पथेर पांचाली’ की याद दिलाती एक अनूठी बांग्ला फिल्म

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प्रसून चटर्जी द्वारा लिखित और निर्देशित बांग्ला फिल्म ‘दोस्तजी’ हाल ही में रिलीज़ हुई है और खूब तारीफ बटोर रही है। बाबरी मस्जिद विध्वंस की पृष्ठभूमि में बनीं ये बांग्ला फिल्म बड़ों की कथा है!प्रस्तुत है फिल्म देखने के बाद कलकत्ता से जय नारायण प्रसाद की त्वरित समीक्षात्मक टिप्पणी। जय नारायण प्रसाद एक वरिष्ठ पत्रकार हैं जो इंडियन एक्सप्रेस समूह के अखबार जनसत्ता कलकत्ता में 28 सालों तक काम करने के बाद रिटायर होकर कलकत्ता में ही रहते हैं। हिंदी में एम ए जय नारायण प्रसाद ने सिनेमा पर व्यापक रुप से गंभीर और तथ्यपरक लेखन किया है। गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी, गायक मन्ना डे, फिल्मकार श्याम बेनेगल, अभिनेता शम्मी कपूर से लेकर अमोल पालेकर, नसीरुद्दीन शाह और शबाना आज़मी तक से बातचीत। जय नारायण प्रसाद ने जाने माने फिल्मकार गौतम घोष की राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त बांग्ला फिल्म ‘शंखचिल’ में अभिनय भी किया है।

छोटे-छोटे दृश्यों के सहारे ‘जिंदगी की बड़ी बातें’ कहने की कला ही किसी फिल्म को बड़ा और बेहतरीन बनाती है। प्रसून चट्टोपाध्याय की बांग्ला फिल्म ‘दोस्तजी’ (Two Friends) ऐसी ही एक फिल्म है। इस बांग्ला मूवी को ढ़ेर सारे अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं। अभी तक आठ अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के अलावा दुनिया के 26 देशों में ‘दोस्तजी’ धूम मचा चुकी है।

11 नवंबर, 2022 को कोलकाता और देशभर में एक साथ जब यह फिल्म रिलीज हुई, तो कोलकाता के ‘नंदन’ प्रेक्षागृह में दर्शकों की भीड़ देखते ही बनती थी।

देखने के पहले तक मुझे लग रहा था यह बच्चों की फिल्म है। मेरी तरह औरों को भी लग रहा होगा ‘दोस्तजी’ कोई चिल्ड्रेन मूवी है। लेकिन, ‘दोस्तजी’ की कथा जैसे-जैसे आगे बढ़ी, लगने लगा यह फिल्म बच्चों की नहीं – बड़ों की कथा है।

‘दोस्तजी’ (टू फ्रेंड्स) की कहानी वाकई शानदार है। लगभग 110 मिनट की यह फिल्म है तो आठ साल के दो बच्चों की कहानी – एक हिंदू बच्चा (पलाश) और दूसरा मुस्लिम बच्चा (सफीकुल)। पर, इन दो दोस्तों की कहानी भारत में 1992 में हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस और 1993 में हुए बंबई बम विस्फोट कांड की पृष्ठभूमि में चलती है।

‘दोस्तजी’ असल में भारत-बांग्लादेश सीमा की कहानी है, जहां बड़ी तादाद में मुस्लिम रहते हैं। हिंदू भी है, पर उनकी जिंदगी सुरक्षित नहीं है। इसी बीच बाबरी मस्जिद तोड़ दी जाती है। सरहद पर रहने वाले मुस्लिम समुदाय के लोग प्रतिक्रिया में अपने गांव में ‘छोटी बाबरी मस्जिद’ बनाना चाहते हैं। प्रतिक्रिया में गांव के हिंदू लोग भी पीछे नहीं रहते। हिंदू लोग गांव में राम-रावण युद्ध का नाटक खेलने की घोषणा करते हैं।

ऐसे में दोनों हिंदू-मुस्लिम बच्चों (दोस्तों) पर गांव की इन घटनाओं का असर पड़ता है। ‘दोस्तजी’ फिल्म की कहानी बस इतनी-सी है। इन सारी घटनाओं के बावजूद दोनों बच्चों की दोस्ती बरकरार रहती है। दोनों मजे से हंसते-खेलते हैं, साथ-साथ स्कूल जाते हैं, साथ-साथ ट्यूशन पढ़ते हैं और अपने गांव में पतंग भी उड़ाते हैं और छोटे तालाब में मछली भी पकड़ते हैं।

तभी एक रोज तालाब में खेलते और मछली पकड़ते वक्त हिन्दू बच्चा (आशिक शेख) डूब जाता है और मारा जाता है। फिल्म ‘दोस्तजी’ की कथा यहीं से टर्न लेती है।

मुस्लिम बच्चा (आरिफ शेख) अकेला पड़ जाता है। उसे लगता है उसका दोस्त कहां चला गया ! वह चीजों को ठीक से समझ नहीं पाता। उसे एहसास होता है उसका दोस्त (पलाश, फिल्म में हिन्दू दोस्त का यही नाम है) कहीं गया नहीं है। यहीं कहीं (जीवित) है प्रकृति में, जीव में और उसकी मासूमियत में। ‘दोस्तजी’ मूवी बहुत बारीकी से चीजों का विश्लेषण करती है।

मुस्लिम बच्चे यानी शफीकुल की भूमिका में आरिफ शेख ने बहुत शानदार भूमिका निभाई है। और हिन्दू बच्चे पलाश की भूमिका में आशिक शेख का रोल भी जीवंत है। वाकई दिलचस्प फिल्म है ‘दोस्तजी’ !

इस फिल्म का छायांकन लाजवाब है। यह काम (छायांकन) तुहिन विश्वास ने किया है और पहली दफा किया है। तुहिन बंगाल में नदिया जिले के राणाघाट में एक प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक है। सिनेमा का शौक उन्हें फिल्म की तरफ खींचा और अपनी आंख (कैमरा) से कमाल कर दिया।

इसी तरह, इस फिल्म का संपादन दो लोगों ने किया है। एक है संजय दत्त राय और दूसरे हैं शांतनु मुखोपाध्याय। क्या शानदार संपादन है ‘दोस्तजी’ का। कई बार तो सत्यजित राय की ‘पथेर पांचाली’ फिल्म की याद दिला देती है।

शुरू में इस फिल्म (दोस्तजी) को निर्माता नहीं मिल रहा था। क्राउड फंडिंग से ‘दोस्तजी’ फिल्म की शूटिंग आरंभ हुई थी। ट्रेलर दिखाकर निर्माताओं को तलाशा गया। पहले प्रसेनजीत रंजननाथ और सौम्य मुखोपाध्याय मिले, फिर ताईवान के ईवी यू-हुआ शेन मिले। इस तरह, यह फिल्म पूरी हुई।

शुरू में लंदन के बीएफाई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में ‘दोस्तजी’ का प्रीमियर हुआ। फिर, शिकागो (अमेरिका) के 39वें शिशु फिल्म समारोह में। उसके बाद इसकी रफ्तार और तेज हुई।‌ शारजाह अंतरराष्ट्रीय शिशु फिल्म समारोह, जापान के नारा अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव, सीआईएफईजे (यूनेस्को) और पोलैंड के कैमरा इमेज फिल्म समारोह में अनेक दर्शकों ने इसे सराहा। चेक गणराज्य के जेडलिन फिल्म महोत्सव में भी ‘दोस्तजी’ ने पुरस्कार जीते।

अब ‘दोस्तजी’ के युवा निर्देशक प्रसून चट्टोपाध्याय के लिए दुनिया ‘और बड़ी’ हो गई है। इसे कहते हैं लगन, दृष्टि और मेहनत !