पंचायत सीज़न 2: ‘फुलेरा’ में दिल लगने की दिलचस्प दास्तान

कोरोना के पहले सीज़न में लॉकडाउन के दौरान आया था पंचायत वेब सीरीज़ का पहला सीज़न। भारतीय गांव को स्टीरियोटाइप और रोमांटिसाइज़्ड, परंपरागत इमेज से निकाल कर आधुनिक जीवन के चाल-चलन और संदर्भों के साथ जिस तरह पेश किया था उसने बहुत तारीफ पायी। पहले सीज़न में कंटेंट की सादगी, गांव के जीवन की जीवंतता और असल जीवन के किरदारों जैसे एक्टर इसकी सबसे बड़ी यूएसपी थे। अब करीब दो साल बाद इसका दूसरा सीज़न रिलीज़ हो चुका है। इसकी त्वरित समीक्षा दे रहे हैं युवा फिल्म समीक्षक सौरभ शर्मा।  मध्य प्रदेश में रहने वाले सौरभ एक एक प्रशिक्षित फोटोग्राफर हैं, जो राष्ट्रीय स्तर पर कई पुरस्कार भी जीत चुके हैं। फिलहाल यूपीएससी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं और साथ में फिल्मों पर गहरी नज़र बनाए रखते हैं और लिखते रहते हैं, क्योंकि सिनेमा और संगीत से उन्हे गहरा लगाव है।

जब आप कहानी के पात्रों के अभिनय को अभिनय समझना बंद कर दें, काल्पनिक गांव की गलियों से वाकिफ़ हो जाएं, जब पात्रों द्वारा कहे गए संवाद आपके हृदय में भी वही समान भाव उत्पन्न कर दें, तब समझ लीजिए कि निर्देशक ने अपना काम पूरी निष्ठा और कुशलता से किया है।

हिंदी फिल्मों में भारत के गावों का चित्रांतरण मोटे तौर पर सरसों के खेत से ले कर चंबल के बीहड़ों तक स्टीरियोटाइप प्रतीकों के बीच ही रहा है। बेशक ये दोनों रूप बहुत ही प्रभावशाली थे पर धरातल पर जा कर गावों की समस्या, पर्व, जश्न, को इतनी अधिक अवधि तक वो भी अविश्वनीय ढंग से पंचायत में प्रस्तुत किया है वह प्रशंसनीय है।

लेखन और पटकथा बेहद चुस्त है, सारे एपिसोड एक दूसरे से गुंथे हुए हैं पर अलग अलग कहानी भी साथ में संजोए हुए हैं जो दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखता है। एक एपिसोड में जब अभिषेक का दोस्त सिद्धार्थ गांव आता है तो गांव को उसके नज़रिए से दिखाया जाता है जो दर्शकों के सामने फुलेरा गांव का एक नया आयाम पेश करता है।

अश्लीलता और फूहड़ता के इस दौर में पंचायत-1 जैसे शो ने भारतीय परिवारों के बीच एक अलग पहचान बनाई थी, और जनता की इस प्रतिक्रिया ने निर्माताओं पर फैमिली शो बनाने का दबाव था, पर उन्होंने इस दबाव को सकारात्मक ढंग से लिया और कहानी को प्राथमिकता दे कर जो महत्वपूर्ण था वही उपचार दिया।

TVF पर प्रवचन देने के कई मौके थे पर उनको सीमाओं का बोध है कि जनता को बहुतायत में उपदेश नहीं चाहिए।

जैसे, नशा मुक्ति वाले एपिसोड में वह भर पेट ज्ञान दे सकते थे, रिंकी और अभिषेक का प्रेम प्रसंग भी बढ़ा-चढ़ा कर दिखा सकते थे, पर वह सब जिस सूक्ष्मता और सादगी से दिखाया वह प्रशंसनीय है।

संवादों से कई बार कम शब्दों में पूरी स्थिति का वर्णन किया गया है, जैसे सिद्धार्थ का कहना “सरसों के खेत नहीं दिख रहे” यह दर्शाता है के भारतीय फिल्मों ने गांव के प्रति हमारे परिप्रेक्ष्य को कैसे ढाला है।

“आप भी तो नाच ही रहे हैं”

“शराबी, वो बन जाता है जो काबिलियत से ज्यादा या कम कमाए” जैसे संवाद भी काफ़ी प्रभावशाली हैं

अंतिम एपिसोड में जिस प्रकार से भावनाओं और बेहतरीन अभिनय का सामंजस्य है वह एक शिथिल शरीर को भी भावुक कर देने में सक्षम है। जिस प्रकार से प्रधान जी प्रह्लाद चाचा को “बेटा” करके संबोधित करते हैं, वह गांव के लोगों के एक दूसरे के प्रति संबंधों को बड़ी ही सुंदरता से दर्शाता है।

पंचायत-2 की खास बात यह है कि यह प्रारंभ तो सचिव के किरदार और जीवन से हुआ था पर अंत तक आते-आते पूरे फुलेरा ग्राम की कहानी बन जाता है और आकर्षण का केंद्र सिर्फ अभिषेक ही नहीं रह जाता।

कंटेंट और पैकेजिंग के मामले में TVF ने एक बार फिर इसबात का लोहा मनवाया है कि उनकी टीम प्रतिभा का भंडार है। पंचायत के पहले सीज़न और अब इसके सीज़न 2 की बदौलत इस टीम ने ओटीटी के कंटेंट को निश्चित तौर पर नए तरीके से परिभाषित किया है, जो आने वाले समय में इसे दशा-दिशा देने में अहम साबित होगा।

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