हीरो, हीरोइन… और प्राण

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Anita Padhye

हिंदी सिनेमा में ऐसी कई फिल्में हैं जिनमें प्राण साहब की मौजूदगी भर उनमें प्राण यानी जान फूंक देती थी। 12 फरवरी को प्राण साहब का जन्मदिन होता है। उनकी जयंती के मौके पर वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका अनिता पाध्ये एक दिलचस्प कहानी के ज़रिए उन्हे याद कर रही हैं। ये कहानी विजय आनंद (गोल्डी) से जुड़ा हुआ है, जिन पर हाल ही में उन्होने ‘एक था गोल्डी’ के नाम से पुस्तक भी लिखी है। अनिता पाध्ये ने वर्षों तक फिल्म पत्रकार के तौर पर काम किया और बीते दो दशक से अधिक से वे टीवी चैनलों से जुड़ी रही हैं। उन्होंने फिल्मों पर कई ख़ास ​पुस्तकें लिखी हैं जिनमें फिल्मी हस्तियों के कहे-अनकहे पहलुओं को उजागर किया गया है।

हिंदी सिनेमा में प्राण एक ऐसे अभिनेता रहे हैं जिनकी मौजूदगी भर सीन को दिलचस्प बना देती थी। उनकी एक्टिंग स्टाइल, हाव-भाव, संवाद अदायगी सभी का एक मुख्तलिफ अंदाज़ था.. और यही वजह रही कि उनका हुनर किरदार के शेड का मोहताज नहीं रहा और उन्होने बेहद नकारात्मक से लेकर बेहद सकारात्मक या ये कहें कि खलनायक से लेकर चरित्र अभिनेता तक के व्यापक रेंज के तमाम किरदार निभाए। उनकी असरदार मौजूदगी की वजह से ही फिल्मों के पोस्टर पर जगह कम होने पर भी हीरो, हीरोइन के साथ उनके नाम का अलग से ज़िक्र ज़रुर होता था जो हिंदी में ‘…और प्राण’ या अंग्रेज़ी में ‘…and Pran’ के तौर पर लिखा होता। बाद में जब Bunny Reuben ने साल 2005 में उन पर किताब लिखी तो उसके शीर्षक के तौर इन्ही दो शब्दों को प्राण सिकंद साहब की कद्दावर सिनेमाई शख्सियत के लिए सबसे मुकम्मल पहचान माना और किताब को नाम दिया ‘…and Pran: A Biography


पर्दे पर निभाए अनगिनत नकारात्मक भूमिकाओं के उलट असल जिंदगी में प्राण साहब एक बेहद अच्छे इन्सान, कद्रदान और दिलदार व्यक्तित्व के धनी थे। यह बात है फिल्म ‘जॉनी मेरा नाम ‘ दौरान की। नायक के साथ उसके भाई की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उस वक्त प्राण ने खलनायक के साथ साथ चरित्र भूमिकाएं करना शुरु कर दिया था। जॉनी मेरा नाम में जो नायक के भाई का व्यक्तित्व भले फिल्म के पहले हिस्से में नकारात्मक दिखाई देता हो, लेकिन बाद सकारात्मक था।

इसलिए फिल्मके निर्देशक विजय यानी गोल्डी आनंद प्राण के घर उनसे मिलने गए और उन्हे फिल्म की कहानी तथा उनका रोल सुनाया तो प्राण को रोल अच्छा लगा। पर जब फिल्म की शूटिंग की तारीखों की बात निकली तो, उन्होंने अपनी डायरी, जिसमें उनकी अन्य शूटिंग डेट्स का लेखाजोखा था; गोल्डी के सामने रख दी। गोल्डी ने डायरी देखी, तो सालभर की एक भी डेट खाली नहीं थी। गोल्डी चुपचाप वहां से निकल गए।  लेकिन ये बात प्राण को अजीब लगी। क्यूंकि अन्य निर्माता-निर्देशकों को जब वह शूटिंग डेट्स न होने की मजबूरी बताते थे, तो वो लोग प्राण के सामने हाथ जोड़कर किसी भी सूरत में डेट्स एडजस्ट करने की गुहार लगाते थे। पर गोल्डी आनंद ने ऐसा कुछ नहीं किया था। यही बात उनको अच्छी लगी थी। इसलिए दो-चार दिन में ही खुद प्राण ने अपने सेक्रेटरी के जरिए गोल्डी आनंद से संपर्क किया और जॉनी मेरा नाम में काम करने के लिए हामी भर दी। अगर उनकी जगह कोई और स्टार कलाकार होता तो, इस बात का बुरा मान जाता कि गोल्डी आनंद ने अकड़ दिखाकर डेट्स के लिए उन्हें जरा भी मनाने की कोशिश नहीं की। लेकिन काम और इन्सान की पहचान और कद्र ही शायद ऐसी खूबी थी, जिसने प्राण को अपने समकालीन तमाम किरदारों से अलग और ऊंचे मुकाम पर खड़ा कर दिया।

जॉनी मेरा नाम का वो किस्सा जो बताता है कि काम को लेकर प्राण साहब कितने प्रोफेशनल थे और अच्छे डायरेक्टर और किरदार की वो कितनी कद्र करते थे। जयंती पर विशेष।