भारतीय सिनेमा की नई इबारत गढ़ती बांग्ला फिल्म ‘दोस्तजी’ पहुंची ताइवान
सत्यजित राय, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन की विरासत (लीगेसी) को निर्देशक प्रसून चटर्जी आगे बढ़ाना चाहते हैं। फिल्म ‘दोस्तजी’ की ताज़ा कामयाबी इसका सबूत है।
सत्यजित राय, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन की विरासत (लीगेसी) को निर्देशक प्रसून चटर्जी आगे बढ़ाना चाहते हैं। फिल्म ‘दोस्तजी’ की ताज़ा कामयाबी इसका सबूत है।
क्रिस्टोफ़र नोलन ने अपनी फिल्म में ग्रीक पुराण कथा और गीता के कर्मवाद को गूँथ कर परमाणु बम बनाने और उसके इस्तेमाल को लेकर ऑपेनहाइमर के बौद्धिक कौशल, मेहनत, महत्वाकांक्षा, प्रेम, निराशा, नैतिक द्वंद्व, अपराध बोध और ऊहापोह को बहुत शानदार अंदाज में पेश किया है।एटम बम की चेन रियेक्शन की आशंका और उससे जुड़ा नैतिक द्वंद्व ऑपेनहाइमर के मन में थे जिसे मुख्य भूमिका निभाने वाले किलियन मर्फी ने बहुत असरदार तरीके से उभारा है।
यह बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं है कि फ़िल्म में बादशाह अकबर के साथ घटी घटनाएं ऐतिहासिक रूप में सत्य है या नहीं। महत्त्वपूर्ण यह है कि यह दंतकथा अकबर जैसे महान बादशाह के बारे में है जो इतिहास में अपनी उदारता और सहिष्णुता के लिए प्रख्यात है और जिसने सारे देश को एकता के सूत्र में बांधने का प्रयत्न किया था और जो इस सच्चाई को समझ चुका था कि इस देश पर शासन तभी किया जा सकता है जब यहां रहने वाले सभी धर्मों के लोगों के बीच बिना किसी तरह का भेदभाव किए व्यवहार किया जाए।
मुग़ले आज़म फ़िल्म में जिस हिंदुस्तान को पेश किया गया है उसके पीछे लोकतांत्रिक भारत के प्रति फ़िल्मकार की आस्था व्यक्त हुई है। यह आस्था भारत की मिलीजुली संस्कृति और धार्मिक सहिष्णुता की परंपरा में भी निहित है। फ़िल्मकार के इस नज़रिए को समझे बिना हम ‘मुग़ले आज़म’ को एक दंतकथा पर बनी प्रेमकहानी मात्र समझने की भूल करेंगे।
‘न्यू डेल्ही फिल्म फाउंडेशन’ सिनेमा से जुड़ी गंभीर पुस्तकों के बारे में जानकारी देने और उनकी विषयवस्तु से परिचित कराने के लिए ऐसी नई पुस्तकों की (पुरानी और महत्वपूर्ण पुस्तकों की भी) नियमित रुप से जानकारी और समीक्षा प्रकाशित करने की शुरुआत कर रहा है।
के आसिफ की ‘मुग़ले आज़म’ जिस विराट महाकाव्यात्मक कैनवास को लेकर बनाई गई थी उसे प्रायः समझा ही नहीं गया। ‘मुग़ले आज़म’ को तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक कि हम इस बात को ध्यान में नहीं रखते कि यह फिल्म विभाजन की भयावह त्रासदी से उभरते देश के एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक राष्ट्र बनने के आरंभिक सालों की समानांतर रचना है।
हाल ही में जारी किये गये फिल्म ‘आदिपुरुष’ के ट्रेलर में भगवान राम के मुंह से निकलने वाले एक संवाद में कहा जा रहा है, ‘आज मेरे लिए मत लड़ना, उस दिन के लिए लड़ना जब भारत की किसी बेटी पर हाथ डालने से पहले दुराचारी तुम्हारा पौरुष याद करने के पहले थर्रा उठेगा।
हंसल मेहता की नई वेब सीरीज़ ‘स्कूप’ में खुद को तीसमारखां समझने वाले तमाम पत्रकारों के लिए सबक है कि खबर देने वाले हर सूत्र का अपना एजेंडा होता है। खबरें योजनाबद्घ तरीके से प्लांट कराई जाती हैं। सावधान नहीं रहे तो मोहरा बनने का खतरा रहता है।
फिल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ एक ऐसे ही सवर्ण बिहारी युवक अभय शुक्ला की कहानी है जिसके पिता गांव में किसानी करते हैं और मां दूसरों के घरों में काम करती है।
मृणाल सेन स्व-शिक्षित तथा स्व-प्रशिक्षित फ़िल्म निर्देशक थे। अपनी फ़िल्म के डॉयलॉग लिखते, एडिटिंग में प्रयोग करते थे। उनका जीवन दर्शन था, ‘पृथ्वी टूट रही है, जल रही है, छिन्न-भिन्न हो रही है। तब भी मनुष्य बचा रहता है, ममत्व, प्यार और संवेदना के कारण।’