अकबर की हुकूमत में एक संगतराश की आवाज़: मुग़ले आज़म 4

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Jawarimall Parakh

के आसिफ की बनाई फिल्म मुग़ले आज़म को रिलीज़ हुए आज 63 साल हो गए। 1960 में 5 अगस्त के दिन ही ये रिलीज़ हुई थी। इस फिल्म को आज भी भारतीय सिनेमा की सबसे भव्य और सबसे संजीदगी से बनाई फिल्म मााना जाता है। इस फिल्म को बेहतर और गहराई से समझने के लिए हम जाने-माने समाजशास्त्री, सिनेविद् व लेखक जवरीमल्ल परखके प्रसिद्ध आलेख ‘मुगले आज़म:सत्ता विमर्श का लोकतांत्रिक संदर्भ’ को 8 अंकों में प्रस्तुत करते जा रहे हैं। यह आलेख उनकी प्रसिद्ध पुस्तकभारतीय सिनेमा का समाजशास्त्र में भी उपलब्ध है। 14 जून को मुगले आज़म के निर्देशकके आसिफके जन्मदिन के मौके पर हुई इस शुरुआत की ये चौथी कड़ी है। 5 अगस्त तक इसके सभी 8 अंक प्रकाशित होने थे, पर अब भी कुछ अंक बाकी रहते हैं, सो इसका प्रकाशन जारी रहेगा। जवरीमल्ल पारख जी साहित्य, सिनेमा और मीडिया पर आलोचनात्मक लेखन एव पटकथा के विशेषज्ञ हैं। ‘लोकप्रिय सिनेमा और सामाजिक यथार्थ’, ‘हिंदी सिनेमा का समाजशास्त्र’, ‘साझा संस्कृति, सामाजिक आतंकवाद और हिंदी सिनेमा’ समेत साहित्य और समाजशास्त्र से जुड़े कई विषयों पर उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित और सम्मानित हो चुकी हैं। न्यू डेल्ही फिल्म फाउंडेशन के टॉक सिनेमा सीरीज़ के तहत आयोजित कई सत्रों में शामिल होते रहे हैं और सिनेमा के सामाजिक पहलुओं पर नई रोशनी डालते रहे हैं। सीरीज़ के रुप में पुस्तक के इस आलेख का प्रकाशन हमारी सिने बुक रिव्यू श्रृंखला की एक कड़ी है।

सलीम-अनारकली की दंतकथा पर बनने वाली पहले की फ़िल्मों से ‘मुग़ले आजम’ का बुनियादी अंतर यह था कि ‘मुग़ले आजम’ अनारकली की कहानी नहीं बल्कि अकबर की कहानी भी है। अनारकली की प्रेमकथा पर आधारित होते हुए भी यह कहानी अकबर से शुरू होती है और उसी पर समाप्त होती है। ‘मुग़ले आजम’ नाम भी यही साबित करता है जो अकबर के लिए प्रयुक्त किया गया है। अनारकली पर बनने वाली पहली मूक फिल्म का नाम सलीम पर आधारित था। ‘दि लव्ज ऑफ ए मुग़ल प्रिंस’ नाम यही बताता है कि यह एक मुग़ल राजकुमार की प्रेम कहानी है। यानी कि नाटककार ‘ताज’ जिसने अनारकली के नाम से नाटक लिखा था, फ़िल्म के संदर्भ में वे अनारकली की बजाए मुग़ल प्रिंस के प्रेम को अधिक महत्त्व देते प्रतीत होते हैं। लेकिन ‘मुग़ले आजम’ के अलावा बाद में बनने वाली फ़िल्मों के नाम अनारकली ही होता है। इस तरह इस प्रेम कथा के तीन प्रमुख पात्रों में से फिल्मकार किस को अधिक महत्त्व देते हैं यह उस फिल्मकार के नज़रिए को समझने का आधार बनता है। ‘मुग़ले आजम’ में सलीम और अनारकली की बजाए अकबर को केंद्र में रखा जाना फ़िल्मकार के नए नज़रिए को बताता है। 

इसे संबंधित ऐतिहासिक वृतांत के रूप में इसलिए भी नहीं देखा जा सकता क्योंकि न सिर्फ अनारकली की ऐतिहासिकता पूरी तरह से दंतकथाओं पर आधारित है बल्कि इतिहास की अन्य सच्चाइयों की भी फ़िल्म में उपेक्षा की गई है। फिर भी यह कहना उचित नहीं होगा कि फ़िल्मकार ने इतिहास और दंतकथा के पारस्परिक अंतःसंबंध को नज़रों से ओझल नहीं होने दिया है। इस फ़िल्म में निर्मित अकबर का चरित्र बहुत कुछ वैसा ही है जैसा हमें इतिहास की पुस्तकों में पढ़ने को मिलता है। एक उदार शासक जो हिंदू और मुस्लिम एकता का जबर्दस्त समर्थक है, जो चाहता है कि इस देश के लोग प्रेम और भाईचारे से रहें। जो धर्म के मामले में न सिर्फ उदार है बल्कि दूसरे धर्मों का उतना ही आदर करता है जितना कि वह इस्लाम का करता है।

मुग़ले आज़म में अकबर को हिंदुस्तान से जोड़ा जाता है लेकिन एक शासक के रूप में ही नहीं बल्कि उसकी परंपरा, मर्यादा और गरिमा की रक्षा करने वाले के रूप में भी। दरअसल, फ़िल्मकार सलीम  और अनारकली की प्रेम कहानी को अकबर और हिंदुस्तान के बीच संबंधों के रूबरू रखकर दिखाता है। अकबर अपने हर कदम और हर फैसले को हिंदुस्तान के हक में किए गए फैसले के रूप में रखता है और इस तरह सलीम और अनारकली की प्रेम कहानी के विरोध का औचित्य वह हिंदुस्तान के प्रति अपने कत्र्तव्य में खोजता है। अकबर का विचार है कि हिंदुस्तान का होने वाला बादशाह एक मामूली कनीज़ से प्रेम करे यह सही नहीं है। अकबर के इस विचार का विरोध सलीम को छोड़कर सत्ता से जुडे़ हुए किसी भी व्यक्ति द्वारा नहीं होता। सलीम का राजपूत दोस्त दुर्जन सिंह, जो फ़िल्म में मानसिंह का बेटा बताया गया है, भी उसका साथ इसलिए नहीं देता कि वह अनारकली से सलीम के प्रेम को उचित मानता है बल्कि इसलिए देता है कि उसके लिए उसकी दोस्ती और वचनबद्धता ज्यादा बड़े मूल्य हैं। इसके विपरीत सलीम और अनारकली के प्रेम का समर्थन उस संगतराश कुमार द्वारा किया जाता है जो अकबर के राज में जनता पर होने वाले जुल्म को अपनी कला में ढालता है। संगतराश उस बौद्धिक वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जो सत्ता के उत्पीड़न के विरुद्ध आवाज उठाने से नहीं डरता, जो अपनी कला को तानसेन की तरह दरबार की शोभा बनाना सही नहीं समझता। वह राज्याश्रय प्राप्त कलाकार नहीं है। हम जानते हैं कि अकबर के समय में भक्ति काव्य का प्रसार हो रहा था और भक्त कवि चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान राज्याश्रय से विमुख रहे थे। इस संगतराश की परंपरा उस भक्ति आंदोलन से जुड़ती है, जिसमें संत और फकीर राजाओं और सम्राटों की उपेक्षा और विरोध का साहस भी दिखा सकते थे। फ़िल्मकार ने किसी फकीर या संत की बजाए संगतराश को इस विरोध की बागडोर सौंपी हालांकि उसे जिस तरह का चोगा पहने हुए फिल्म में दिखाया जाता है वह संगतराश को फकीरों-सा आभास देता है। अकबर काल में ऐसे विद्रोही संगतराश की उपस्थिति इतिहास के नज़रिए से एक महत्त्वपूर्ण विचलन है। कला को राज्य का अनुवर्ती बनाने से इन्कार करना यदि इसे भक्ति आंदोलन से जोड़ता है तो संगतराश का नज़रिया उसे आधुनिक युग से संबद्ध करता है।

संगतराश द्वारा कला में यथार्थ की अभिव्यक्ति मुग़ल काल का नहीं बल्कि आधुनिक काल का प्रतिनिधित्व करती है। कला में ऐसे यथार्थ की अभिव्यक्ति उस दौर में शुरू ही नहीं हुई थी लेकिन के. आसिफ अपनी फ़िल्म में एक ऐसे कलाकार को रचते हैं जो राजसत्ता के विरोध को कला के माध्यम से वाणी देता है। बाद में वह कलाकार सलीम की मौत की सजा के खिलाफ एक जन प्रदर्शन का नेतृत्व करता है। यहां फिर एक ऐसे जनआंदोलन की कल्पना कर ली गई है जो उस मध्ययुग में इस तरह मुमकिन ही नहीं था। इस तरह ‘मुग़ले आज़म’ में एक तरफ अनारकली है और दूसरी तरफ अकबर बादशाह है। इन दोनों के बीच का संघर्ष ही इस प्रेमकथा को परंपरागत प्रेमकथा से अलग करता है। यह एक शाहजादे और कनीज की त्रासद प्रेमकथा ही नहीं है बल्कि एक बादशाह की कहानी है जो इस प्रेम का विरोध देश हित की दुहाई देते हुए करता है। अभिजात वर्ग द्वारा अपने हित को राष्ट्रीय हित समझना अनोखी बात नहीं है बल्कि हम वर्तमान पूंजीवादी शासक वर्ग में इस बात को बड़े प्रबल रूप में देखते हैं। इस फ़िल्म में अकबर एक सामंती शासक नहीं है बल्कि प्रतीकात्मक रूप में एक बूूज्र्वा शासक भी है जो राष्ट्रीयता की दुहाई देते हुए गैरबराबरी का औचित्य साबित करना चाहता है। ‘मुग़ले आज़म’ शासक वर्ग के इस जनविरोधी नज़रिए का न सिर्फ समर्थन करती है बल्कि उसे गरिमा मंडित भी करती है।

इसके बावजूद फ़िल्म की विशेषता यह है कि वह अभिजात वर्ग के विरोध में सक्रिय वर्ग शक्तियों की सही पहचान करती है। फ़िल्म यह भी बताती है कि अकबर का शासन चाहे जितना उदार, सहिष्णु और पूरे राष्ट्र को एकता के सूत्र में बाॅंधकर रखने वाला क्यों न हो, आखिरकार वह एक खास वर्ग के हित में काम करने वाला शासन है। यदि उसका विरोध किया जाना है तो वह सिर्फ वर्गीय नज़रिए से संभव है। यह विरोध करते हुए भी उन मूल्यों की रक्षा किया जाना जरूरी है अकबर का शासन जिसका प्रतीक है। अकबर के शासन के जिन मूल्यों को यह फ़िल्म खासतौर पर महत्त्व देती है वह है धार्मिक सहिष्णुता, हिंदू मुस्लिम एकता, सभी के लिए समान न्याय और अपनी जनता के हित के लिए कार्य करना। इस प्रकार एक निरंकुश सामंती शासन और एक धर्मनिरपेक्ष, जनहितैषी और न्यायप्रिय शासक के बीच का यह द्वंद्व ही है जिसका इस फ़िल्म में अत्यंत कौशल और समझदारी के साथ चित्रण किया गया है। इस फ़िल्म की प्रासंगिकता और महत्त्व इसी द्वंद्व में निहित है। यह उस दौर के प्रगतिशील तबके के एक हिस्से के अपने वैचारिक द्वंद्व की रचनात्मक अभिव्यक्ति भी है।

फ़िल्म के आरंभिक हिस्से में ही जब बहार (निगार सुल्ताना) संगतराश के पास जाती है और उससे सलीम के लिए मुजस्समा (मूर्ति) बनाने के लिए कहती है तो वह जबाब देते हुए कहता है कि ”मेरे बनाए हुए मुजस्समे शहंशाहों को पसंद नहीं आएंगे“। बहार पूछती है, ”क्यों?“। तो वह जबाब देता हैः ”क्योंकि ये सच बोलते हैं“। कला में सच की अभिव्यक्ति का यह आग्रह कला के प्रति आधुनिक दृष्टिकोण का परिणाम है। कला में ऐसे यथार्थ की अभिव्यक्ति करना जिसमें जन भावनाओं और नज़रिए की भी अभिव्यक्ति हो, यथार्थवाद के प्रभाव का परिणाम है। वह दिवारों पर बने प्रतिमा चित्रों को दिखाता है जिनमें सामंती सत्ता के सच को उकेरा गया है। इस सच को अभिजात वर्ग के नज़रिए से नहीं बल्कि जनता के नज़रिए से देखा गया है। पहला चित्र बादशाह के दरबार का है जहां बादशाह न्याय-अन्याय का निर्णय लेते हैं। इस चित्र पर टिप्पणी करते हुए संगतराश कहता हैः ”शहंशाह की जबान से निकला हर लफ्ज इंसाफ है जिसकी कोई फरियाद नहीं“। दूसरे चित्र में मैदाने जंग का चित्रण किया गया है। इस पर टिप्पणी करते हुए संगतराश कहता हैः ”और ये मैदाने जंग है…लाखों लोगों की मौत और एक इंसान की फतह“। तीसरे चित्र में हाथी के पैरों तले एक आदमी को कुचलता हुआ दिखाया गया है जिस पर टिप्पणी करते हुए संगतराश कहता हैः ”और ये है, सच बोलने का अंजाम, सजा-ए-मौत“। बहार इन चित्रों पर टिप्पणी करते हुए कहती है, ”ये सच नहीं है, संगतराश, ये एक कलाकार का तंज है“।

pic courtesy: Eagle Movies

संगतराश के बनाए हुए चित्र और उस पर की गई उसकी टिप्पणियां मध्ययुगीन कला का प्रतिनिधित्व नहीं करती और न ही मध्ययुगीन सोच का। यहां तक कि कबीर जैसे क्रांतिकारी कवियों में भी राजसत्ता के विरोध की वह चेतना नहीं है जो इस संगतराश में दिखाई देती है। यहां फिर फ़िल्मकार ने मध्ययुग में आधुनिक युग को समाहित कर दिया है। एक सामंत चाहे कितना ही सहिष्णु, उदार और न्यायप्रिय होने का दावा क्यों न करता हो, उससे न्याय की आशा करना व्यर्थ है। यह इसलिए भी मुमकिन नहीं है क्योंकि सामंती व्यवस्था में सारे निर्णय एक व्यक्ति के विवेक (और अविवेक) पर निर्भर होते हैं। सामंतशाही की यह आलोचना आधुनिक और जनवादी सोच से प्रेरित है। दूसरे चित्र में युद्धों का विरोध किया गया है। संगतराश का नज़रिया यह है कि मध्ययुगीन युद्ध न देश हित में और न समाज हित में लड़े जाते थे। उसमें दोनों पक्षों में मारे जाने वाले लोगों को इन युद्धों से कुछ नहीं मिलता, यदि किसी को कुछ मिलता है तो वह बादशाह है जो इन युद्धों के द्वारा अपने राज्य और सत्ता का विस्तार करता है। अकबर ने भी ऐसा ही किया था। इतिहासकारों ने लिखा है कि अकबर का यह मानना था कि निरंतर युद्ध और साम्राज्य विस्तार द्वारा ही अपने शासन को सुरक्षित रखा जा सकता है।

संगतराश के चित्र में व्यक्त युद्ध विरोधी यह दृष्टिकोण आधुनिक है। इसका अकबर के साथ खासतौर पर संबंध जोड़ना बहुत उचित नहीं है क्योंकि दूसरे सामंती शासकों की तुलना में अकबर ने युद्धों में निरपराध नागरिकों की हत्या करने, उनको लूटने, स्त्रियों को हवस का शिकार बनाने और विजित लोगों का धर्म परिवर्तन कराने पर प्रतिबंध लगाए थे। लेकिन इस चित्र का औचित्य इस बात में निहित है कि वह शासकों के युद्धों के पीछे की वास्तविकता को उजागर करता है। यह शांति और सद्भावना का वह नज़रिया है जिसे गांधी और दूसरे प्रगतिशील विचारकों ने लगातार सामने रखा था। यहां संगतराश उसी नज़रिए को जाहिर करता है। बहुत संभव है कि यह शीतयुद्ध दौर के उस शांति आंदोलन का प्रभाव हो जो इस फ़िल्म के निर्माण के समय अपने उत्कर्ष पर था और जिसमें उस समय के उर्दू और हिंदी के बहुत से लेखक भी सक्रिय थे। तीसरा चित्र सीधे-सीधे सामंती उत्पीड़न का प्रतीक है और इस तरह की सजा देने का चलन अकबर के राज में भी था और जिसे संगतराश सच बोलने का अंजाम कहता है। हाथी के पैरों तले कुचलवा देना और दिवार में जिंदा चुनवा देना दोनों ही सामंती उत्पीड़न के क्रूर उदाहरण है। अनारकली की दंतकथा में उसका दिवार में चुनवा देने की हकीकत इसी ऐतिहासिक सच में निहित है। संगतराश का यह कथन कि ”ये है, सच बोलने का अंजाम सजा-ए-मौत।“ यहां इसलिए महत्वपूर्ण है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की यह चेतना कलाकारों में एक आधुनिक अवधारणा है। बाद के एक प्रसंग में यह फनकार अकबर से अपनी कला के खुले प्रदर्शन की मांग करता है।

‘मुग़ले आज़म’ की पूरी कथा इन्हीं तीन चित्रों के इर्दगिर्द बुनी गई है। अकबर द्वारा एक कनीज को मौत की सजा देना उस चित्र की माफिक है जिसमें बताया गया है कि ”शहंशाह की जबान से निकला हर लफ्ज इंसाफ है जिसकी कोई फरियाद नहीं“। अनारकली के लिए सलीम और अकबर में युद्ध होना जंग के उस चित्र की तरह है जिसके बारे में संगतराश कहता है, ”और ये मैदाने जंग है… लाखों लोगों की मौत और एक इंसान की फतह“। अनारकली का दिवार में चुनवा दिया जाना उस तीसरे चित्र के समान है जिसके बारे में संगतराश कहता है, ”और ये है, सच बोलने का अंजाम, सजा-ए-मौत“। इस प्रकार ‘मुग़ले आज़म’ फ़िल्म एक साथ अकबर के बारे में दो विरोधी नज़रिए को अपने में समाहित किए हुए चलती है। राष्ट्रवादी नज़रिए से अकबर यदि एक महान सम्राट है तो वर्गीय दृष्टि से वह एक निरंकुश सामंत हैं। फ़िल्म में दोनों में से किसी का निषेध नहीं किया गया है। फ़िल्म दोनों के प्रति ईमानदार रहते हुए एक कलात्मक संतुलन की सृष्टि करने का यत्न करती है। इन दोनों के द्वंद्व में ही इस फ़िल्म की सफलता और लोकप्रियता निहित है।

राज दरबार में संगतराश की यथार्थवादी कला की क्या कद्र हो सकती है। बहार उससे ऐसा मुजस्समा बनाने का आग्रह करती है जो साहिबे आलम को प्रभावित करे। संगतराश इसके लिए तैयार हो जाता है। वह इस चुनौती को स्वीकार करते हुए कहता है, ”मैं ऐसा बुत बनाऊंगा जिसके आगे सिपाही अपनी तलवार, शहंशाह अपना ताज और इंसान अपना दिल निकालकर रख दे“। लेकिन संगतराश ऐसा बुत नहीं बनाता। वह बुत की बजाए नादिरा नाम की एक खूबसूरत कनीज को बुत बनाकर खड़ा कर देता है। यहां फिर यथार्थ में निहित सुंदरता कला की सुंदरता की तुलना में कहीं ज्यादा प्रभावशाली होती है। किसी स्त्री का बुत वास्तविक स्त्री से ज्यादा संुदर नहीं हो सकता। संगतराश की स्त्री-प्रतिमा की सुंदरता को सुनकर सलीम अपनी उत्सुकता नहीं रोक पाता और वह रात के अंधेरे में चुपके से अपने दोस्त दुर्जन सिंह के साथ जाकर उसे देख लेता है। उस कथित प्रतिमा को देखकर वह दुर्जन सिंह को कहता है, ”संगतराश का दावा बेहद सही था। बुतों की खुदाई तस्लीम करने का जी चाहता है“। इस पर दुर्जन सिंह सलीम को सावधान करते हुए कहता है, ”साहिबे आलम पर बुतपरस्ती का इल्जाम लग जाएगा“। इस्लाम में बुतपरस्ती को पाप समझा गया है। सलीम मुसलमान होने के कारण मूर्ति पूजा को स्वीकार करने की बात नहीं कर सकता। लेकिन वह कनीज बनी मूर्ति के सौंदर्य को देखकर अपनी भावना नहीं रोक पाता और वह ऐसी टिप्पणी करता है जो धर्म के भले ही प्रतिकूल हो लेकिन जिसमें सलीम के दिल की  आवाज़ झलकती है। इसीलिए वह दुर्जन सिंह की बात पर टिप्पणी करते हुए कहता है, ”मगर वफापरस्ती की दाद भी मिल जाएगी“। कनीज के सौंदर्य से खुद बादशाह अकबर प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। उस ‘बुत’ की प्रशंसा करते हुए वह कहते हैं, ”मालूम होता है जैसे किसी फरिश्ते ने आसमां से उतरकर संगमरमर में पनाह ले ली हो“। अकबर भी कमोबेश वही बात दोहरा रहा है। अकबर भी पत्थर की मूर्ति में देवताओं के होने की कल्पना करता है। अकबर और सलीम के मुख से कहलाई गई ये टिप्पणियां बहुत अहम है। ‘मुग़ले आज़म’ में अकबर न सिर्फ मूर्ति और चित्रकला को बढ़ावा देते हुए दिखाया गया हैं बल्कि बुतपरस्ती के प्रति भी उनमें सम्मान का गहरा भाव दिखाया गया है। इस प्रसंग के तत्काल बाद के दृश्य में कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर पूजा के अवसर पर महारानी जोधा के साथ वे न सिर्फ मौजूद रहते हैं बल्कि बाल कृष्ण को झूला भी झूलाते हैं। जोधाबाई एक हिंदू स्त्री की तरह उनको तिलक करती है और प्रसाद देती है। स्वयं अकबर वहां हिंदू पति की तरह दिखते हैं और आचरण करते नज़र आते हैं।

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यही नहीं अनारकली जब पहली बार दरबार में गाती है तो वह कृष्ण के जीवन से संबंधित प्रसंग पर गीत गाती हैः ”मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे“। इस गीत पर ब्रजभाषा का असर साफ देखा जा सकता है। भक्ति काव्य में ब्रजभाषा का संबंध कृष्ण कथाओं से बहुत गहरा रहा है। अनारकली घाघरा, कंचुकी और ओढ़नी पहने हुए यह गीत गाती है। यहां अनारकली अपने को राधा के रूप में और सलीम को कृष्ण के रूप में देखती है और अपने प्रेम का इजहार करती है। इस तरह एक मुस्लिम बादशाह सिर्फ कला को बढ़ावा नहीं देता बल्कि इस्लामी रूढ़िबद्धता से ऊपर उठकर एक बुतपरस्त धर्म को न सिर्फ आदर देता है बल्कि उसे बराबरी का हक प्रदान करता है। ‘मुग़ले आज़म’ में हिंदू मुस्लिम एकता की कोशिशें बहुत दूर तक जाती है। अनारकली दरबार में कृष्ण जीवन से संबंधित गीत गाती है तो कैदखाने में वह ”सरकारे मदीना“ को याद करती है।

फ़िल्म में इस बात पर बहुत बल दिया गया है कि जोधाबाई एक हिंदू राजपूत स्त्री है जिसका अपना धर्म है, अपनी मर्यादा और अपनी परंपराएं हैं। अकबर की पत्नी होकर भी जोधाबाई हिंदू स्त्री ही बनी रहती है। वह अकबर के दरबार में न सिर्फ राजपूती पोशाक में रहती है बल्कि हिंदू की तरह अपने धर्म का पालन करती है। अकबर अपनी पत्नी की धार्मिक आस्था और पारंपरिक मर्यादा का हमेशा खयाल रखता है। ‘अनारकली’ में जोधाबाई का चित्रण एक मां की तरह तो किया गया है लेकिन एक हिंदू और राजपूत स्त्री की तरह नहीं किया गया है। ‘मुग़ले आज़म’ में फ़िल्मकार जोधाबाई की इन पहचानों के प्रति खासतौर पर सजग नज़र आता है। यह सजगता अकबर के संदर्भ में बहुत महत्त्वपूर्ण है।

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मुग़ल-ए-आज़म फ़िल्म की शुरुआत में लांग शॉट में अपने लाव-लश्कर के साथ अकबर के समकालीन सूफी फकीर सलीम चिश्ती की दरगाह पर जाते हुए दिखाया जाता है। तपते हुए रेगिस्तान पर तनहा चलता हुआ अकबर इस उम्मीद के साथ फकीर की दरगाह तक जाता है कि उनके आशीर्वाद से वह पिता बन सकेगा। लांग शॉट में अकबर के साथ उनका लाव-लश्कर नज़र आता है जिसमें हाथी, घोड़े और सिपाही हैं। मिड शाट में इस लाव-लश्कर के बावजूद अकबर के अकेलेपन को उभारा जाता है जिसे गहराई क्लोज अप में अकबर के परेशान और थके हुए चेहरे से मिलती है। बाद में अकबर सलीम चिश्ती के आगे अपना सिर झुकाता हुआ दिखाया जाता है। फ़िल्म में कथावाचक कहता हैः ”उस शहंशाह जिसके आगे सारी दुनिया झुकती है, एक फकीर की सरकार में अपना सिर झुका लिया“। एक साधारण आदमी की तरह फकीर के दरवाजे तक अकबर का पैदल जाना और वहां अपने को उनके चरणों में झुका लेना पिता बनने की उसकी इच्छा ही नहीं बल्कि बादशाह की हस्ती के ऊपर एक फकीर (भारतीय परंपरा में जिसे संत भी कहा जा सकता है) को मानने की परंपरा की अभिव्यक्ति है। इस्लामी परंपरा के अनुसार फ़िल्म में सलीम चिश्ती को सशरीर नहीं दिखाया जाता। सिर्फ उनके हाथों की झलक मिलती है। वह अकबर को आशीर्वाद के रूप में फूल देते हैं और वह फूल अकबर जोधाबाई को दे देता है जो उस फूल को अपने गाल से छुआकर अपनी श्रद्धा को प्रकट करती है। यहां निर्देशक ने सूफी फकीर को फूल देते हुए दिखाया है, पर्दे पर क्लोज अप में फकीर के हाथ नजर आते हैं। लेकिन उन फूलों को लेने के लिए बढ़े हुए हाथ अकबर के नहीं होते बल्कि जोधाबाई के होते हैं। जोधाबाई जो अकबर के साथ फकीर के दर्शन करने नहीं गई थी लेकिन फूल देते हुए फकीर के हाथ से सीधे जोधाबाई के फूल लेते हुए हाथों के शॉट को मिलाने से ऐसा असर होता है मानो फकीर ने सीधे जोधाबाई को ही आशीर्वाद दिया हो। यह पूरा प्रसंग उन पौराणिक कथाओं से मेल खाता है जिसमें किसी संत के आशीर्वाद से पुत्र-प्राप्ति की कहानियां कही गई हैं। इस तरह यह पूरा प्रसंग अपनी सरंचना में भारतीय कथाओं का असर छोड़ता है। सलीम चिश्ती के आशीर्वाद से बच्चा होने के कारण अकबर के बच्चे का नाम भी सलीम रखा जाता है।

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संगतराश फिल्म में तब फिर आता है जब अनारकली से अलग करने के लिए सलीम को अकबर जंग के लिए भेज देता है। अकबर संगतराश को दरबार में बुलाता है। अकबर उसका स्वागत करते हुए कहता है, ”हमें यह जानकर खुशी हुई कि हमारी सल्तनत में तुम जैसा संगतराश आबाद है“। इस बात का जबाब देता हुआ संगतराश निर्भय होकर कहता है, ”लेकिन सच है कि मैं आपकी सल्तनत में बर्बाद हूँ“। अकबर उसके इस कथन को शाब्दिक रूप में ही लेते हुए उसे तरह-तरह के इनाम देने की बात कहता है। जिसमें जमीन-जायदाद और हीरे-जवाहरात शामिल है। इसके बावजूद अकबर संगतराश को प्रभावित नहीं कर पाता बल्कि वह चाहता है कि बादशाह उसे अपने फ़न को सल्तनत के कूचे-कूचे में फैलाने की इजाजत दे। बादशाह यह इजाजत दे देते हैं। संगतराश की इस तरह की मांग इस दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है कि मध्ययुग में कला को लोगों तक पहुंचाने की इस तरह की मांग करने की चेतना कलाकारों में उस तरह से नहीं थी जिस तरह आज हम देखते हैं। अकबर काल में राजसत्ता के सामने किसी भी तरह की कला की तरफ से कोई चुनौती नहीं थी। फ़नकार समझता है कि अकबर और उसके बीच बात पूरी हो चुकी है और वह जाने की इजाजत मांगता है। लेकिन अकबर बताता है कि अभी इनाम पूरा नहीं हुआ। वह उसे बताता है कि कल उसकी शादी अनारकली के साथ कर दी जाएगी। फ़नकार सकते में आ जाता है। अकबर पूछता है कि ”क्या ये बहुत कम है?“ संगतराश इस पर व्यंग्य में जवाब देता है, ”उम्मीद से कहीं ज्यादा।… आज मैं जिल्लेलाही के इंसाफ का कायल हो गया“।  अकबर संगतराश के व्यंग्य को नहीं समझ पाता। अपने घर पहुंच कर वह अपने ही बनाए उस चित्र के सामने खड़ा होता है जहां बादशाह इंसाफ कर रहे हैं  और वह उसे देखते हुए कहता हैः ”शहंशाहों के इंसाफ और जुर्म में कितना कम फर्क होता है।“ संगतराश की यह टिप्पणी इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है कि वह यह जानता है कि अनारकली से उसकी शादी का मतलब है दो प्यार करने वाले दिलों को हमेशा के लिए एक दूसरे से जुदा करना। संगतराश यह स्वीकार नहीं कर सकता था इसलिए वह इस बात की सूचना जाकर सलीम को दे आता है। इस तरह वह अपने को राजसत्ता के विरुद्ध होने वाले विद्रोह के साथ जोड़ लेता है।

अनारकली के लिए सलीम और अकबर के बीच युद्ध होता है जिसमें सलीम हार जाता है और बंदी बना लिया जाता है। सलीम पर इल्जाम लगाया जाता है कि उसने मुग़ल शासन के खिलाफ बगावत की है और दुर्जन सिंह जैसे वफ़ादार को बगावत के लिए भड़काया है। उससे कहा जाता है कि अनारकली को वापस कर दे तो उसे छोड़ दिया जाएगा। सलीम अनारकली को सौंपने के लिए तैयार नहीं होता। अकबर उस पर इल्जाम लगाता है कि ”तुम हिंदुस्तान के मुकद्दस तख्त पर एक हसीन लौंडी को बैठाना चाहते हो।“ सलीम जबाब देते हुए कहता है , ”और आप इस भरे दरबार में अपनी होने वाली बहू को जलील करना चाहते हैं।“

अकबर राज्य के प्रति विद्रोह के जुर्म में सलीम को सजाए मौत का हुक्म सुनाते हैं। वह यह घोषणा करते हैं कि ”इंसाफ हमें अपने बेटे से ज्यादा अज़ीज़ है“। सलीम इस पर टिप्पणी करते हुए कहता है, ”एक संगदिल शहंशाह मौत से ज्यादा किसी को दे भी क्या सकता है“। उसे किले में ऊंचे स्थान पर बांध दिया जाता है ताकि उसे तोप से उड़ाया जा सके। विभिन्न लांग शाॅट से लिए गए ये दृश्य काफी प्रभावशाली हैं। एक तरफ जंगी तोप है जो राजसत्ता की ताकत की प्रतीक है। दूसरी तरफ ऊंची जगह पर बंधा हुआ शाहजादा है जो प्यार के लिए शहीद होने के लिए तैयार है और तीसरी तरफ लोगों की भीड़ है जो वहां सलीम के समर्थन में जमा है। उनमें संगतराश भी शामिल है। संगतराश उनके बीच ऐसे मौजूद है, जैसे उनका नेतृत्व कर रहा हो। वहां खड़े लोगों को संबोधित करते हुए सलीम कहता है, ”आज का तारीखी दिन अकबरे आज़म की शिकस्त का और मोहब्बत की फतह का दिन है। मैं तुम्हारा शुक्रगुजार हूँ और उन मांओं को दुआएं देता हूँ जिन्होंने सच्चाई और मोहब्बत की खातिर अपनी संतानें कुरबान कर दी। मेरी आखिरी इल्तिजा है, दुनिया में दिलवालों का साथ देना दौलत वालों का नहीं“। वहां मौजूद संगतराश और दूसरे लोग ‘साहिबे आलम जिंदाबाद’ के नारे से आकाश गुंजा देते हैं और इसी जिंदाबाद को संगतराश एक चुनौती गीत में बदल देता है। वह गाने लगता हैः ”वफा की राह में आशिक की ईद होती है खुशी मनाओ कि मोहब्बत शहीद होती है।…ए मोहब्बत जिंदाबाद“।

pic courtesy: Eagle Movies

इस गीत के बोल सीधे, कुछ हद तक सपाट लेकिन आम आदमी पर तत्काल असर करने वाले हैं। इसके गायन में वह शास्त्रीयता नहीं है जो अकबर के दरबार में गाये जाने वाली तानसेन की गायकी में सुनाई देती है। इस दो तरह की गायकी के कंट्रास्ट का इस्तेमाल फ़िल्म में बहुत सोच-विचार कर किया गया है। ‘मोहब्बत जिंदाबाद’ वाले इस गीत को मोहम्मद रफ़ी से गवाया गया है। लेकिन इस ‘मोहब्बत जिंदाबाद’ के संदेश में भी सांस्कृतिक एकीकरण की कोशिश को साफ तौर पर देखा जा सकता है। इस गीत के पहले अंतरे में मंदिर और मस्जिद और मुरली की तान और अजान की आवाज़ में जो एकता व्यक्त की गई है अकबर ने भी इस एकता के लिए प्रयास किया था। इस तरह संगतराश का आदर्श इस मामले में अकबर से अलग नहीं है लेकिन गीत के शेष अंतरों का संबंध राजसत्ता की ताकत और प्रेम की ताकत के बीच के अंतर को दिखाना है। गीत में मुख्य बल इस बात पर है कि प्यार ही बुनियादी चीज है न कि राजसत्ता। सत्ता की चाहना करने वाले प्यार को हासिल नहीं कर सकते। इस प्रकार गीत में अकबर के संदेश को स्वीकार करते हुए भी उससे आगे एक व्यापक मानवतावादी संदेश देने का प्रयास है। संदेश निश्चय ही बहुत सीधे और सपाट ढंग से दिया गया है। ”ए मोहब्बत जिंदाबाद“ और ”प्यार के दुश्मन हो जाएगा बरबाद“ जैसे बोलों में यह साधारणता कुछ हद तक खटकती भी है। लेकिन इस तरह के चुनौती भरे गीतों में इस तरह की भाषा का अपनाना शायद बहुत गलत नहीं है। इस प्रकार ‘मुग़ले आज़म’ में संगतराश की रचना एक खास मकसद से की गई है। यह इस दंतकथा को जहां आधुनिक आयाम देता है वहीं संगतराश के माध्यम से फ़िल्मकार का नज़रिया अपनी पूर्णता में उभरकर सामने आता है। लेकिन यहां इस बात को भी ध्यान में रखा जाना जरूरी है कि संगतराश के नेतृत्व में होने वाला प्रदर्शन सलीम के लिए है न कि अनारकली के लिए। अनारकली का कैदखाने में जंजीरों में जकड़कर बंद किया जाना, किसी भी सार्वजनिक विरोध का कारण नहीं बनता। अकबर जिसकी पहचान एक न्यायकारी राजा के रूप में होती है, इस फ़िल्म में सलीम को सजा देने के लिए कमजोर सी ही सही न्याय की एक प्रक्रिया दिखाई देती है। लेकिन अनारकली के मामले में तो ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती। सलीम और अनारकली के बीच का यह फ़र्क अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

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