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Holocaust Book
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होलोकास्ट की पुनर्रचना और दर्द से गुज़रता सिनेमा

“नाजी यातना शिविरों की त्रासद गाथा”, मानव इतिहास के इन सबसे काले पलों को फिल्मों के माध्यम से याद करती है। दो सौ छप्पन पृष्ठों की ये किताब बीस फिल्मों के माध्यम से होलोकास्ट के दौर के जीवन और समाज को देखने समझने वाली फिल्मों की पड़ताल करती है।

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‘उद्देश्यपूर्ण फिल्मों’ की अगली कड़ी है ‘द केरल स्टोरी’

‘द केरल स्टोरी’ जैसी फिल्म मनोवैज्ञानिक रूप से दर्शकों पर यह दबाव बनाती है कि वह अपना स्टैंड तय कर लें, कि वे किस तरफ खड़े हैं और इसी में फिल्म की कामयाबी का राज छुपा हुआ है।

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अरुण खोपकर की ‘चलत् चित्रव्यूह’ अब हिंदी में

प्रसिद्ध मराठी लेखक-फिल्मकार अरुण खोपकर की साहित्य अकादमी से सम्मानित मराठी पुस्तक ‘चलत चित्रव्यूह’ के हिंदी अनुवाद की समीक्षा। ये पुस्तक फिल्म और कला जगत की महान हस्तियों से जुड़े उनके संस्मरणों का संग्रह है।

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‘एकमात्र सत्यजित राय…’ – ऋत्विक कुमार घटक

जो भी हो, सत्यजित बाबू के शिल्पकर्म को लेकर यह आलोचना नहीं है। उनकी ‘पथेर पांचाली’ हम लोगों को या मेरी ज्ञान-पिपासा को कैसे संतुष्ट करती है, इसका लाक्षणिक बखान भर है यह ! सत्यजित राय पर ऋत्विक घटक के दुर्लभ आलेख का जयनारायण प्रसाद का किया हिंदी अनुवाद।

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मनोज बाजपेयी: कुछ पाने की ज़िद

मनोज को न केवल हर मोड़ पर उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा था बल्कि अपनी लंबाई, वजन, सेक्स अपील की कमी और व्यक्तित्व में करिश्मा न होने जैसे ताने भी सुनने पड़ रहे थे। मनोज कहते हैं, ‘मेरे थिएटर के अनुभव की यहाँ कोई कीमत ही नहीं थी। मैं हैरान था कि निर्माता-निर्देशकों को एक अनुभवी अभिनेता और एक नए-नवेले अभिनेता में फर्क की कोई ज़रुरत नहीं थी।’

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सच्चे ‘जन कलाकार’ थे बलराज साहनी

बलराज साहनी ने केवल अभिनेता ही नहीं बल्कि एक अध्यापक, नाट्य लेखक-निर्देशक, रेडियो उद्घोषक, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता जैसे कई महत्वपूर्ण कार्यों को पूरी ईमानदारी के साथ किया। उनके भीतरी और बाहरी रूप में कोई अलगाव न था। देश और देश की जनता के लिए कुछ बेहतर और अच्छा करने की बेचैनी ने उन्हें लाहौर, शांतिनिकेशन, सेवाग्राम(वर्धा), लंदन, बंबई और न जाने कहाँ-कहाँ घुमाया, लेकिन इन सभी जगहों से एक कलाकार के रूप में उन्होंने बहुत कुछ पाया।

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ओटीटी कंटेंट में गंदगी पर बॉलीवुड भी बोलने लगा

खुलकर के गाली-गलौज और अश्लील संवादों का इस्तेमाल सबसे पहले फिल्मों में फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप ने न सिर्फ शुरू किया था, बल्कि ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और ‘रियलिस्टिक क्रिएटिव टच’ के नाम पर इसको लगातार जस्टिफाई भी करते रहे।

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‘द एलिफेंट व्हिस्परर्स’ को इसलिए मिला ऑस्कर

बेली बताती है कि मेरी बेटी के मर जाने के बाद रघु का आना ऐसा लगा कि बेटी ही वापस आ गई, रघु ने अपनी सूंड से मेरे आँसू पोंछे.. वह छोटे बच्चों की तरह मेरे कपड़े खींचता था, मुझे उसका प्यार महसूस हुआ और रघु ने भी मुझमें मां की-सी सुगंध को अनुभव किया होगा…

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फिल्म लेखक व्रजेंद्र गौड़ की याद में

हिंदी फिल्मों का वो लेखक जिसके लिखे संवादों में हीरो विनोद खन्ना और हीरोइन सायरा बानो टैगोर और निराला की कविता को लेकर चर्चा करते हुए दिखे थे।

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