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Mughal e Azam
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मुग़ले आज़म 2: इतिहास, दंतकथा और कल्पना का अंतर मिटाने वाली फिल्म

मुग़ले आज़म फ़िल्म में जिस हिंदुस्तान को पेश किया गया है उसके पीछे लोकतांत्रिक भारत के प्रति फ़िल्मकार की आस्था व्यक्त हुई है। यह आस्था भारत की मिलीजुली संस्कृति और धार्मिक सहिष्णुता की परंपरा में भी निहित है। फ़िल्मकार के इस नज़रिए को समझे बिना हम ‘मुग़ले आज़म’ को एक दंतकथा पर बनी प्रेमकहानी मात्र समझने की भूल करेंगे।

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Cine Book Review: सिने बुक रिव्यू के बारे में

‘न्यू डेल्ही फिल्म फाउंडेशन’ सिनेमा से जुड़ी गंभीर पुस्तकों के बारे में जानकारी देने और उनकी विषयवस्तु से परिचित कराने के लिए ऐसी नई पुस्तकों की (पुरानी और महत्वपूर्ण पुस्तकों की भी) नियमित रुप से जानकारी और समीक्षा प्रकाशित करने की शुरुआत कर रहा है।

Mughal e Azam
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मुग़ले आज़म 1: भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा महाकाव्य

के आसिफ की ‘मुग़ले आज़म’ जिस विराट महाकाव्यात्मक कैनवास को लेकर बनाई गई थी उसे प्रायः समझा ही नहीं गया। ‘मुग़ले आज़म’ को तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक कि हम इस बात को ध्यान में नहीं रखते कि यह फिल्म विभाजन की भयावह त्रासदी से उभरते देश के एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक राष्ट्र बनने के आरंभिक सालों की समानांतर रचना है।

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‘आदिपुरुष’ की प्रमोशनल स्ट्रेटजी के मायने

हाल ही में जारी किये गये फिल्म ‘आदिपुरुष’ के ट्रेलर में भगवान राम के मुंह से निकलने वाले एक संवाद में कहा जा रहा है, ‘आज मेरे लिए मत लड़ना, उस दिन के लिए लड़ना जब भारत की किसी बेटी पर हाथ डालने से पहले दुराचारी तुम्हारा पौरुष याद करने के पहले थर्रा उठेगा।

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हंसल मेहता का ‘स्कूप’: चौथे खंबे के अंधकूप की अंतर्कथा

हंसल मेहता की नई वेब सीरीज़ ‘स्कूप’ में खुद को तीसमारखां समझने वाले तमाम पत्रकारों के लिए सबक है कि खबर देने वाले हर सूत्र का अपना एजेंडा होता है। खबरें योजनाबद्घ तरीके से प्लांट कराई जाती हैं। सावधान नहीं रहे तो मोहरा बनने का खतरा रहता है।

Ab Dilli Dur Nahin
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‘अब दिल्ली दूर नहीं’: IAS बनने दिल्ली आए बिहारी छात्र की कहानी

फिल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ एक ऐसे ही सवर्ण बिहारी युवक अभय शुक्ला की कहानी है जिसके पिता गांव में किसानी करते हैं और मां दूसरों के घरों में काम करती है।

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मृणाल सेन: कम्फ़र्ट ज़ोन लाँघने वाले फ़िल्मकार

मृणाल सेन स्व-शिक्षित तथा स्व-प्रशिक्षित फ़िल्म निर्देशक थे। अपनी फ़िल्म के डॉयलॉग लिखते, एडिटिंग में प्रयोग करते थे। उनका जीवन दर्शन था, ‘पृथ्वी टूट रही है, जल रही है, छिन्न-भिन्न हो रही है। तब भी मनुष्य बचा रहता है, ममत्व, प्यार और संवेदना के कारण।’

Holocaust Book
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होलोकास्ट की पुनर्रचना और दर्द से गुज़रता सिनेमा

“नाजी यातना शिविरों की त्रासद गाथा”, मानव इतिहास के इन सबसे काले पलों को फिल्मों के माध्यम से याद करती है। दो सौ छप्पन पृष्ठों की ये किताब बीस फिल्मों के माध्यम से होलोकास्ट के दौर के जीवन और समाज को देखने समझने वाली फिल्मों की पड़ताल करती है।

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‘उद्देश्यपूर्ण फिल्मों’ की अगली कड़ी है ‘द केरल स्टोरी’

‘द केरल स्टोरी’ जैसी फिल्म मनोवैज्ञानिक रूप से दर्शकों पर यह दबाव बनाती है कि वह अपना स्टैंड तय कर लें, कि वे किस तरफ खड़े हैं और इसी में फिल्म की कामयाबी का राज छुपा हुआ है।

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