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‘चंपारण मटन’: ‘मटन’ की ख्वाहिश, ‘चंपारण’ का प्रतिरोध

फिल्म ‘चंपारण मटन’ की सफलता की सार्थकता सिर्फ ऑस्कर नाम से जुड़े चकाचौंध वाले मुकाम या उससे जुड़े तमाम आंकड़ों भर में नहीं है.. ‘चंपारण मटन’ की कामयाबी इस फिल्म को देखकर ही समझा जा सकता है। ये वो सिनेमा है जो हमें आज चाहिए।

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अपने बूते खड़ा होना सिखाती ‘लव ऑल’

हिंदी सिनेमा में बैडमिंटन को आधार बना ‘साइना’ नाम से बायोपिक भी बन चुकी है।  लेकिन वह फ़िल्म कोई ख़ास कमाल नहीं दिखा पाई थी। परन्तु ‘लव ऑल’ उसी कमी को पूरा करती है और एक देखने लायक फिल्म बन जाती है।

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ओएमजी2: सेंसर के 27 कट और ए सर्टिफिकेट पर सवाल क्यों?

फिल्म ‘ओ माई गॉड 2’ को सेक्स एजुकेशन पर बनी एक बेहतरीन फिल्म करार दिया जा रहा है और साथ ही फिल्म सेंसर बोर्ड द्वारा 27 कट के बाद दिये गये ‘ए’ सर्टिफिकेट पर भी आपत्ति  जताई जा रही है। अब ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह फिल्म वाकई में एक एजुकेशनल फिल्म है, और यदि यह एजुकेशनल फिल्म है तो यह किन लोगों को एजुकेट करती है, और क्यों करती है?

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गुलज़ार की फिल्मों का ज़िंदगीनामा

एक शायर और गीतकार के तौर पर गुलज़ार आज भी सक्रिय हैं, लोकप्रिय हैं और प्रासंगिक हैं। बल्कि साल दर साल उनकी लोकप्रियता और मुकाम और ऊंचाई हासिल करता जा रहा है। 89वें जन्मदिन के मौके पर चर्चा फिल्मकार गुलज़ार और उनकी फिल्मों की।

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OMG2: एक ‘मस्ट वॉच’ फिल्म

निर्देशक अमित राय ने बड़े तार्किक और दिलचस्प सिनेमाई कौशल के साथ अपनी नई फिल्म ‘ओह माय गॉड -2’ में यह सवाल उठाया है कि हमारे स्कूली पाठ्यक्रम में सेक्स एजुकेशन जरूरी क्यों है?

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बदल चुका है पाकिस्तान का सिनेमा ‘जिंदगी तमाशा’ से

“जिंदगी तमाशा” पाकिस्तान की एक ऐसी फिल्म है जिसे देखते समय आप अपनी सांसों तक को महसूस करना भूल जाते हैं। फिल्म एक मौलवी के संघर्ष को बयां करती है। जिसका डांस करते एक वीडियो वायरल हो जाता है।  उसके बाद लोग उसके खिलाफ हो जाते हैं। लोग कहते हैं कि जो शख्स पांच का वक्त नमाज पढ़ता है वो ऐसा कैसे कर सकता है। इसी कहानी को लेकर पाकिस्तान में विवाद हो गया।

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मुग़ल ए आज़म 4: अकबर की हुकूमत में एक संगतराश की आवाज़

‘मुग़ले आज़म’ की पूरी कथा इन्हीं तीन चित्रों के इर्दगिर्द बुनी गई है। अकबर द्वारा एक कनीज को मौत की सजा देना उस चित्र की माफिक है जिसमें बताया गया है कि ”शहंशाह की जबान से निकला हर लफ्ज इंसाफ है जिसकी कोई फरियाद नहीं“। अनारकली के लिए सलीम और अकबर में युद्ध होना जंग के उस चित्र की तरह है जिसके बारे में संगतराश कहता है, ”और ये मैदाने जंग है… लाखों लोगों की मौत और एक इंसान की फतह“। अनारकली का दिवार में चुनवा दिया जाना उस तीसरे चित्र के समान है जिसके बारे में संगतराश कहता है, ”और ये है, सच बोलने का अंजाम, सजा-ए-मौत“।

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भारतीय सिनेमा की नई इबारत गढ़ती बांग्ला फिल्म ‘दोस्तजी’ पहुंची ताइवान

सत्यजित राय, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन की विरासत (लीगेसी) को निर्देशक प्रसून चटर्जी आगे बढ़ाना चाहते हैं। फिल्म ‘दोस्तजी’ की ताज़ा कामयाबी इसका सबूत है।

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विज्ञान के उद्देश्य और वैज्ञानिक की नैतिकता का मुद्दा उठाती है ‘ऑपेनहाइमर’

क्रिस्टोफ़र नोलन ने अपनी फिल्म में ग्रीक पुराण कथा और गीता के कर्मवाद को गूँथ कर परमाणु बम बनाने और उसके इस्तेमाल को लेकर ऑपेनहाइमर के बौद्धिक कौशल, मेहनत, महत्वाकांक्षा, प्रेम, निराशा, नैतिक द्वंद्व, अपराध बोध और ऊहापोह को बहुत शानदार अंदाज में पेश किया है।एटम बम की चेन रियेक्शन की आशंका और उससे जुड़ा नैतिक द्वंद्व ऑपेनहाइमर के मन में थे जिसे मुख्य भूमिका निभाने वाले किलियन मर्फी ने बहुत असरदार तरीके से उभारा है। 

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मुग़ले आज़म 3: शहंशाह अकबर के ‘राष्ट्रवाद’ की महागाथा

यह बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं है कि फ़िल्म में बादशाह अकबर के साथ घटी घटनाएं ऐतिहासिक रूप में सत्य है या नहीं। महत्त्वपूर्ण यह है कि यह दंतकथा अकबर जैसे महान बादशाह के बारे में है जो इतिहास में अपनी उदारता और सहिष्णुता के लिए प्रख्यात है और जिसने सारे देश को एकता के सूत्र में बांधने का प्रयत्न किया था और जो इस सच्चाई को समझ चुका था कि इस देश पर शासन तभी किया जा सकता है जब यहां रहने वाले सभी धर्मों के लोगों के बीच बिना किसी तरह का भेदभाव किए व्यवहार किया जाए।

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