इरफ़ान: जो गायब भी हैं, हाज़िर भी…

Alok Sharma

इरफ़ान… जिनकी पर्दे पर मौजूदगी ही सीन को ग़ौर से देखने पर मजबूर कर देती थी… इरफ़ान यानी वो अदाकार जो आंखों से सब कुछ कह देता था… और जब बोलता था तो देखने वाले के दिलोदिमाग पर पूरा किरदार छप जाता था…; उन बोलती आंखों को बंद हुए दो साल पूरे हो गए…लेकिन ये टीस अब भी कायम है कि थोड़ा वक्त और मिला होता तो सिनेमा और सिनेमा को चाहने वालों के हिस्से कुछ और नगीने आए होते। आज ज़िंदगी से वो भले गायब हों पर अपनी अदाकारी के बूते लोगों के दिलों में अब भी हाज़िर हैं। इरफ़ान की दूसरी बरसी पर उन्हे याद कर रहे हैं आलोक शर्मा, जो फिल्म-टीवी-एनीमेशन से बतौर लेखक, निर्देशक और निर्माता जुड़े हुए हैं।

आँखों से एक्टिंग, हॉलिवुड फिल्में, फलाना ठिकाना सब चल रहा था टीवी पर जब उस रोज़ ज़रा देर से उठा… लगा आज उठा न होता तो शायद बेहतर होता, बटरफ्लाई इफेक्ट ही हो लेता शायद… शायद इरफान… यहीं होते।

चंद्रकाँता में पहली बार देखा था बद्रीनाथ को, उसकी उन कौड़ी जैसी आँखों को पहली बार। “और इसमें शामिल हैं” में जब कास्ट का नाम दिखाया गया तो पता लगा इरफान है उनका नाम। फिर तो चँद्रकाँता के मेन हीरो बन गये बद्रीनाथ, साथ में पण्डित जगन्नाथ मानो उसके कमिश्नर गॉर्डन। इसके बाद इरफान सही मानों में तब नज़र आये, जब हम जवानी की दहलीज़ पर पाँव धरने ही वाले थे। हासिल नाम का वो बवण्डर आया जिसमें इरफान ने मीम्स युग आने के पहले वनलाईनर्स और उनकी डिलीवरी का हौलनाक़ अंदाज़ दिखाया। ट्रेलब्लेज़र किसे कहते हैं इरफान ने बिना ज़्यादा बात किये हासिल में बता दिया।

फिल्मों के नाम और उनमें उनकी एक्टिंग की बात करनेवाले मीरा नायर और एंग ली की बातें करेंगे, तिग्माँशु धुलिया और लँचबॉक्स की बातें होंगीं। सब क्लिशे बातें हैं, बातें करनी है तो याद कीजिये कैसे इरफान अपनी अदाकारी की वजह से चॉकलेट, थैंक यू और द किलर जैसी कत्तई भूलनीय फिल्मों में भी शानदार थे। पान सिंह तोमर मैं माँ के साथ देखने गया था, लाजवाब फिल्म के इण्टरवल होते ही हम दोनों के मुँह से एक साथ निकला – “बढ़िया फिल्म है!” इस फिल्म की जान थे इरफान, और उनकी “कहो हाँ…!”

उनके सबसे मशहूर पाँच – दस – पंदरह – सौ डायलॉगों की कई फेहरिस्त आयेंगी, मगर क्या कोई ये बता पायेगा कि कैसे अपने डायलॉग में ‘अबे…’ को ऐसा मुक़ाम दे गये इरफान कि वही उनकी अदाकारी का लोहा बन गया? किसी अबे में हताशा थी, किसी में याराना लाड़ था, किसी में धमकी तो किसी अबे में हारे आदमी की बेबसी थी। हमने उस कलाकार को खोया है जिसने “अबे…” को मास्टरपीस बना दिया।

ये वो ऊँचा और आला दर्ज़ा अदाकार था जिसकी अदायगी में जो बेपरवाही और आवारापन था, उसे पाने की कोशिश में बड़े उम्दा एक्टर ताउम्र स्ट्रगल करते हैं। बहुत पहले किसी विदेशी फिल्म मैग्ज़ीन में एक लेख पढ़ा था कि कुछ एक्टर किसी भी सीन को सिर्फ अपनी उपस्थिति से बाईस प्रतिशत बेहतर कर देते हैं डायलॉग बोले बिना ही। इरफान उन एक्टर्स में से थे।

हॉलिवुड-लोलुप हिंदी एक्टर्स जो इण्टरनेशनल हवाई अड्डे जा आते हैं तो भी एक्सेण्ट पकड़ लेते हैं, और जो पौने तीन सेकण्ड का रोल पा जायें इण्टरनेशनल स्टार बन जाते हैं। ऐसे एक्टरों के बीच दुनिया भर की फिल्मों में सहज इण्डियन एक्सेण्ट में अंग्रेजी बोलते इरफान की ताक़त उनका अभिनय ही नहीं उनका वो सात्त्विक अहंकार भी है जिसके चलते अपने नाम से ख़ान और नवाबी हैंगओवर उन्होंने काट फेंका था।

जिगर मुरादाबादी ने शायद ऐसे ही वक़्त के लिये लिखा होगा, जब ये लिखा होगा – ज़िंदगी इक हादसा है और कैसा हादसा,मौत से भी ख़त्म जिस का सिलसिला होता नहीं इरफान के जिस्म के सुपुर्दे ख़ाक हो जाने से उनकी ज़िंदगी का सिलसिला ख़त्म होता नहीं दिखता।

आज इरफ़ान की दूसरी बरसी है। सिनेमा ने ही नहीं, हम ने भी बहुत कुछ खो दिया है उनके जाने से। कहो हाँ…

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